जानें कार्तिक पूर्णिमा कब है? महत्व और पूजन विधि

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कार्तिक पूर्णिमा

हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक का महीना (अक्टूबर-नवंबर) बहुत पवित्र माना जाता है. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है.

कार्तिक पूर्णिमा कब है?

कार्तिक पूर्णिमा हर वर्ष कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी के दिन मनाई जाती है जो कि दीपावली के ठीक 15 दिन बाद आती है. कार्तिक पूर्णिमा का उत्सव प्रबोधिनी एकादशी से शुरू होकर पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है, इस प्रकार यह पर्व पूरे पांच दिनों तक चलता है. इस साल कार्तिक पूर्णिमा 19 नवंबर, 2021 को मनाई जाएगी.

कार्तिक पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?

विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु का पहला अवतार मत्स्यावतार कार्तिक पूर्णिमा की संध्या पर ही अवतरित हुआ था. कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव शंकर ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का संहार किया था जिस कारण इसे ‘त्रिपुरी पूर्णिमा’ भी कहा जाता है और तभी से भोले शंकर को ‘त्रिपुरारी’ कहा जाने लगा. त्रिपुरासुर राक्षस का अंत होने की खुशी में देवताओं ने दीप जलाकर खुशी मनाई थी. इसलिए इस दिन को ‘देव दीपावाली’ के रूप में भी जाना जाता है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सभी देवी-देवता गण देवलोक से शिव की पवित्र नगरी काशी यानि वाराणसी {बनारस} में पधारते हैं. इसलिए यहां के लोगों द्वारा वाराणसी के गंगा घाट पर भव्य रूप से देव दिवाली का आयोजन किया जाता है. गंगा के घाटों पर असंख्य दीपक जलाकर और गंगा स्नान करके बड़े ही उत्साह के साथ दिवाली मनाई जाती है.

कार्तिक पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है?

कार्तिक पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से मां लक्ष्मी, भगवान विष्णु, शिवशंकर और चंद्रदेव का पूजन किया जाता है. इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दीपदान, यज्ञ और ईश्वर की उपासना का विशेष महत्व माना गया है. इस दिन किए जाने वाले दान-पुण्य समेत कई धार्मिक कार्य विशेष फलदायी होते हैं. 

पुराणों के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा का दिन धार्मिक और अध्यात्मिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है.

कार्तिक पूर्णिमा पर भगवान विष्णु का पूजन करके उन्हें खीर का भोग लगाया जाता है और लक्ष्मी-नारायण की आरती के पश्चात् तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि इसी दिन मां तुलसी धरती पर अवतरित हुईं थी. इसलिए विष्णु जी को तुलसी अर्पित करने से अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है.

इस दिन संध्याकाल में जल में दीपक दान करने से माता लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं. इसलिए इस दिन दीपावली की ही भांति शाम को दीपक जलाकर यह उत्सव मनाया जाता है.

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

पुराणों में कार्तिक मास को बहुत खास माना गया है. कार्तिक का यह महीना वैष्णों भक्त, शैव भक्तों और सिक्ख धर्म के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. कार्तिक मास में पड़ने वाली पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा को मोक्षदायिनी माना गया है.

पूरे कार्तिक माह में पूजा, अनुष्ठान, जप-तप, गंगा-स्नान व दीपदान का विशेष महत्व माना जाता है. मान्यता है कि भगवान श्री हरि विष्णु भी चार माह की निद्रा के पश्चात् इसी माह में जागते हैं.

कार्तिक पूर्णिमा न केवल हिंदू धर्म के लोगों के लिए ख़ास है बल्कि सिक्ख धर्म के लोगों के लिए भी इसका ख़ास महत्व है.

सिक्ख संप्रदाय के संस्थापक और सिक्खों के प्रथम गुरु ‘गुरु नानकदेव जी’ का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा के ही दिन हुआ था. इस वर्ष 19 नवंबर 2021 को गुरु नानकदेव जी की 552वीं जयंती मनाई जाएगी. सिक्ख धर्म के अनुयायी इस दिन को ‘प्रकाशोत्सव’, ‘प्रकाश पर्व’ या ‘गुरु पर्व’ के रूप में मनाते हैं क्योंकि नानकदेव जी ने सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों को दूर करके लोगों के जीवन में नया प्रकाश भरा था.

सिक्ख धर्म के लोग इस दिन सुबह-सुबह वाहे गुरु, वाहे गुरु जपते हुए प्रभात फेरी निकालते हैं और नगर कीर्तन करते हैं. इस दिन श्रद्धालु गुरूद्वारे में जाकर गुरुवाणी सुनते हैं और गुरु नानकदेव जी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

गुरुद्वारों में देर रात तक शबद-कीर्तन, अरदास और लंगर का भी आयोजन चलता रहता है. इस पावन पर्व पर सिक्ख धर्म के आस्था केंद्र स्वर्ण मंदिर अमृतसर में भारी मात्रा में श्रद्धालु पहुंचकर आस्था की डुबकी लगाते हैं.

सबको इंसानियत का पाठ पढ़ाने वाले गुरु नानकदेव जी मौलिक आध्यात्मिक विचारक, महान दार्शनिक और एक सच्चे देश भक्त थे.

उन्होंने बाह्य आडंबरों का विरोध करते हुए अपनी शिक्षाओं के द्वारों पूरे समाज को धर्म-जाति के झगड़ों से ऊपर उठकर सदैव इंसानियत व नेकी की राह पर चलने का संदेश दिया.  

आप सभी को कार्तिक पूर्णिमा एवं प्रकाश पर्व दी लख-लख बधाइयां.