मकर संक्रांति का महत्व – मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?

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मकर संक्रांति का महत्व - मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?

मकर संक्रांति भारत में मनाया जाने वाला हिंदुओं का प्रमुख त्यौहार है. यह त्यौहार भारत के साथ-साथ नेपाल व बांग्लादेश में भी बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है. आइए जानते हैं कि मकर संक्रांति का महत्त्व क्या है? और मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?

प्रकाश से प्रेरित होने का पर्व है मकर संक्रांति

मकर संक्रांति भगवान सूर्य की उपासना का सबसे बड़ा पर्व है. इस दिन भगवान सूर्य की पूजा गायत्री मंत्र के साथ की जाती है. यह पर्व है प्रकाश की तरफ़ बढ़ने का, यह पर्व है अज्ञानता से ज्ञान की ओर चलने का, यह पर्व है जीवन से शुष्कता को समाप्त करके नवीन ऊर्जा का संचार करने का. जिस तरह सूर्य के प्रकाश से समस्त प्राणियों का जीवन जगमगा उठता है, उसी तरह ये पर्व भी आपके जीवन को खुशियों और प्रकाश से भर दे, यही इस पर्व का संदेश है. यह पर्व हमें भगवान भास्कर के गुणों यानि ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश को अपने भीतर लाने और दूसरों तक फैलाने का संदेश देता है.

मकर संक्रांति क्या है? – अर्थ

सूर्य जब एक राशि को छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तब उसे संक्रांति कहा जाता है. सूर्य जिस भी राशि में प्रवेश करता है, उसी राशि के नाम से संक्रांति जानी जाती है. ‘मकर संक्रांति’ में मकर शब्द 12 राशियों में से एक मकर राशि को बताता है और संक्रांति शब्द का अर्थ है संक्रमण अर्थात् एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना या एक-दूसरे से मिलना. मकर संक्रांति यानि सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने का संक्रमण काल.

मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?

मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर से जाकर मिली थी, इसीलिए इस दिन गंगा सागर में स्नान का विशेष महत्त्व माना जाता है. मान्यता है कि गंगा स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस समय नई-नई फ़सल जो पककर तैयार हो चुकी होती है, काटी जाती है और किसानों के घर अन्न से भर जाते हैं. इस ख़ुशी में लोग अन्न देवता की पूजा करते हैं, पहली फ़सल से तैयार किया गया पहला अन्न या भोग भगवान को चढ़ाते हैं और अच्छा-अच्छा खाना खाते हैं.

मकर संक्रांति कब मनाई जाती है?

पौष माह में जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है तब मकर संक्रांति मनाई जाती है. हर साल यह त्यौहार 14 या 15 जनवरी को संपूर्ण देश में धूमधाम से मनाया जाता है.

इसी दिन से सूर्य की उत्तरायण गति शुरू होती है, इसलिए इस त्यौहार को उत्तरायणी भी कहते हैं. कहा जाता है कि इस दिन सूर्य भगवान अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं और शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए इस पर्व को मकर संक्रांति कहा जाता है.

कर्नाटक में यह त्यौहार ‘संक्रांति’ के नाम से, पंजाब में ‘लोहड़ी’, तमिलनाडु और केरल में ‘पोंगल’, आंध्रप्रदेश में ‘माघी संक्रांति’, उत्तर प्रदेश व बिहार में ‘खिचड़ी संक्रांति’ और असम में ‘माघ बिहू’ या ‘भोगली बिहू’ के नाम से जाना जाता है.

मकर संक्रांति मनाने का वैज्ञानिक कारण क्या है?

  • इस दिन सूर्य की किरणें ज्यादा प्रभावी व पॉजिटिव होती हैं. इस दिन सूर्य जब उत्तर की और गमन करता है तो उसकी किरणें धरती के समस्त जीवों के लिए लाभदायक और स्वास्थ्यवर्धक होती हैं. उत्तरायण में सूर्य की गर्माहट हमें ठंड से बचाती है.
  • इस दिन नदी में स्नान करने से तमाम शारीरिक बीमारियां दूर होती हैं.
  • मकर संक्रांति का पर्व जनवरी में आता है, इसलिए जनवरी की सर्दी से बचने के लिए इस मौसम में तिल-गुड़ का सेवन किया जाता है, जो हमारे शरीर को ऊर्जा देता है.
  • इस दिन चावल और काली उड़द की दाल की मिश्रित खिचड़ी का सेवन किया जाता है क्योंकि, खिचड़ी पाचन क्रिया को दुरुस्त रखती है, इम्यूनिटी बढ़ाती है और इसमें शीत को शांत करने की शक्ति होती है.

मकर संक्रांति कैसे मनाई जाती है?

इस दिन लोग सुबह-सुबह पवित्र नदी में स्नान करते हैं. मिठाइयां व पकवान के साथ तिल-गुड़ के लड्डू खाते हैं. शीत ऋतु की ठंड की वजह से हमारे शरीर में जो शुष्कता व खुश्की आ जाती है, उसे मिटाने के लिए तिल व गुड़ से बने व्यंजनों का सेवन किया जाता है और पतंग उड़ाई जाती हैं. इस अवसर पर नदियों व गंगा किनारे बसे हुए नगरों में मेले का आयोजन किया जाता है. इसमें बंगाल में गंगा सागर का मेला बहुत प्रसिद्द है.

दान का है विशेष महत्त्व

इस पावन पर्व पर किए गए धार्मिक कार्यों व दान का विशेष महत्त्व है. माना जाता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना बढ़कर पुनः प्राप्त होता है, इसलिए लोग इस दिन तिल-गुड़, अन्न, खिचड़ी, कंबल तथा वस्त्र आदि का खूब दान करते हैं.

प्रकृति में बदलाव की शुरुआत है मकर संक्रांति

इस पर्व की मूल धारणा एक ही है, प्रकृति को नमन करना और प्रकृति की उपासना करना. इस दिन से मौसम में बदलाव होना शुरू हो जाता है. रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं और ठंड का असर भी कम होने लगता है. दिन बड़े हो जाने से सूर्य का प्रकाश हमें अधिक देर तक मिलता है जो कि समस्त जीवों और फ़सलों के लिए भी आवश्यक है और रातें छोटी हो जाने से अंधकार का समय कम हो जाता है. यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन और जीवन में नई स्फूर्ति, चेतना, उत्साह और नई उमंग के आगमन का भी प्रतीक है.

उड़ती पतंग हमारी ज़िंदगी की उड़ान का प्रतीक

पतंग के बिना संक्रांति उसी तरह अधूरी है, जिस तरह डोर के बिना पतंग अधूरी है. कुछ जगहों पर तो खासकर गुजरात में इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा है. पतंग ख़ुशी, हर्ष, उल्लास और ज़िंदगी की उड़ान का प्रतीक है. कागज का एक छोटा सा टुकड़ा जो एक दिन पतंग बन जाता है, हमें ये सिखाता है कि जिस तरह डोर से कटी पतंग अपना रास्ता भटक जाती है ठीक उसी तरह ज़िंदगी में तमाम ऊंचाइयों को छूने के बाद भी हमें, हर कदम पर अपनों के साथ और नैतिक मूल्यों की ज़रुरत पड़ती है, वरना उनके बिना हम भी रास्ता भटक सकते हैं.

पतंग से डोर का रिश्ता बहुत ही गहरा है. जिस तरह से खुले आसमान में लहराती- बलखाती हुई पतंग की डोर, उड़ाने वाले के हाथ में होती है और डोर को जरा सी ढील देते ही पतंग कट जाती है, उसी तरह हमारे जीवन की डोर उस शक्ति के हाथों में है जो संपूर्ण श्रृष्टि को अपने अलौकिक प्रकाश से उदीयमान किये हुए है यानि की सूर्य.