मित्रता दिवस कब है 2021 – Friendship Day 2021

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मित्रता दिवस कब है

ईश्वर मनुष्य को जन्म के साथ अनेकों संबंध बनाकर इस धरती पर भेजता है. लेकिन मित्रता एक ऐसा संबंध है, जो मनुष्य के जन्म के साथ शुरू नहीं होता. मित्र बनाने का अधिकार ईश्वर ने स्वयं मनुष्य को ही दिया है.

मित्रता मानव जीवन का ऐसा अनमोल संबंध है जो मरते दम तक मनुष्य को इससे बांधे रखता है. जीवन में हर संबंध बनाने से पहले मनुष्य उसकी जात-पात, धर्म, घर, व्यापार, समाज में स्थान आदि देखता है लेकिन, एक सच्ची मित्रता को पाने के लिए यह सब नहीं देखा जाता.

मित्रता दिवस कब है?

इस वर्ष 2021 में ‘फ्रैंडशिप डे’ अर्थात् ‘मित्रता दिवस’ 1 अगस्त को मनाया जाएगा. मित्रता हृदय से हृदय को जोड़ने वाला बहुत ही ख़ूबसूरत संबंध है. यूं तो मित्रता दिवस को मनाने के लिए किसी ख़ास अवसर की आवश्यकता नहीं लेकिन फिर भी हमारे देश भारतवर्ष में ‘मित्रता दिवस’ को अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से अगस्त माह के प्रथम रविवार को मनाया जाता है.

सच्ची मित्रता का अर्थ

सच्ची मित्रता का अर्थ है: दो व्यक्तियों के बीच का वह पावन संबंध जिसमें एक दूसरे के प्रति निःस्वार्थ प्रेम, स्नेह एवं सम्मान की भावना हो और जो सदैव एक-दूसरे के हित की कामना करें.

सच्चा मित्र वही है जो हृदय की गहराइयों से और प्रेम व स्नेह की भावना के पवित्र बंधन से हमारे साथ अटूट रूप से जुड़ा हो. विश्वासपात्र मित्र जीवन की औषधि समान होता है.

कविवर तुलसीदास जी लिखते हैं:

”कुपंथ निवारि सुपंथ चलावा

गुण प्रगटहि, अवगुणहि दुरावा”

अर्थात् सच्चा मित्र सदैव अपने मित्र को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है. वह हमारे दुर्गुणों को छुपाता है और अच्छे गुणों को प्रकट करता है.

रहीमदास जी लिखते हैं:

”कहि रहीम संपत्ति सगे, बनत बहुत बहु रीत

विपत्ति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत”

अर्थात् सुख के समय या धन-संपत्ति पास होने पर अनेकों मित्र बन जाते हैं लेकिन, आपत्ति, संकट एवं परेशानियों में साथ देने वाला व्यक्ति ही सच्चा मित्र कहलाता है.

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सच्ची मित्रता के उदाहरण  

हिंदू धर्म में सच्ची मित्रता के अनेकों उदाहरण देखने को मिलते हैं. जिनमें से कुछ से आज हम आपको अवगत कराने जा रहे हैं.

कृष्ण सुदामा की मित्रता  

मित्रता की पराकाष्ठा को भी पार कर देने वाले कृष्ण सुदामा की मित्रता से शायद ही कोई व्यक्ति अंजान हो. त्रिभुवन के स्वामी वासुदेव श्री कृष्ण अपने बालसखा सुदामा के हृदय की हर बात बिना कहे ही जान लेते हैं और बिना कुछ मांगे ही अपने मित्र को सब कुछ दे देते हैं.

भगवान् श्री कृष्ण ने सुदामा जी के साथ जो मित्रता स्थापित की थी, वैसा दृष्टांत और कहीं भी देखने को नहीं मिलता.

कृष्ण सुदामा की मित्रता सम्पूर्ण जनमानस के समक्ष यह उदाहरण रखती है कि मित्र केवल मित्र होता है. मित्रता में न तो कोई अमीर होता है और न ही कोई ग़रीब. जिसके पास मित्रता रूपी खज़ाना है, वह संसार का सबसे भाग्यशाली और धनी व्यक्ति है.

राम सुग्रीव की मित्रता  

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित हिंदू धर्म के महान ग्रंथ ‘रामायण’ से हम सभी को आधुनिक जीवन में बहुत सी बातें सीखने को मिलती हैं.

श्रीराम ने अपने जीवनकाल में सभी संबंधों का मर्यादापूर्वक निर्वाह किया इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है. मित्रता के संबंध को भी श्रीराम ने अपने जीवन में बखूबी निभाया.

चाहे वह वानरराज सुग्रीव से मित्रता हो, निषादराज केवट से मित्रता हो या फ़िर विभीषण से मित्रता हो, इन सभी संबंधों को श्रीराम ने जीवन पर्यन्त सच्चे हृदय से निभाया.

रामायण के ‘किष्किंधा कांड’ में राम सुग्रीव की मित्रता का बहुत ही सुंदर प्रसंग मिलता है. श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता स्मरणीय है.

प्रभु श्रीराम व वानर राज सुग्रीव की मित्रता तब होती है जब, राम अपने पिताजी महाराज दशरथ के वचनानुसार, 14 वर्ष के वनवास में रह रहे थे. राक्षसराज रावण के द्वारा सीता हरण के पश्चात राम लक्ष्मण दोनों भाई माता सीता की खोज में चित्रकूट से निकलकर दक्षिण की ओर मलय पर्वत की ओर जाते हैं.

वहीं पर दोनों की भेंट ऋषयमुख पर्वत पर एक गुफ़ा में रहने वाले सुग्रीव से होती है. किष्किंधा नरेश बाली के छोटे भाई सुग्रीव अपने भाई के डर के कारण छिपकर एक गुफा में रह रहे थे. वहीं पर श्रीराम सुग्रीव के सामने मित्रता का प्रस्ताव रखते हैं.

राम सुग्रीव के साथ अग्नि को साक्षी मानकर अपनी मित्रता की प्रतिज्ञा लेते हैं और इस तरह दोनों में घनिष्ट मित्रता स्थापित हो जाती है.

श्रीराम अपनी मित्रता का वचन निभाते हुए सुग्रीव को किष्किंधा का राज सिंहासन वापस दिलाने में सहायता करते हैं और सुग्रीव भी माता सीता का पता लगाने में राम लक्ष्मण की सहायता करते हैं और उन्हीं के सैनिकों द्वारा श्रीराम को यह पता चल पाता है कि लंकापति रावण माता सीता का अपहरण करके उन्हें लंका ले गया है.

तब सुग्रीव राम, लक्ष्मण और अपनी सेना के साथ सीता को बचाने लंका की ओर प्रस्थान करते हैं. इस प्रकार राम सुग्रीव की मित्रता हमारे सामने निःस्वार्थ प्रेम और दोस्ती का उदाहरण प्रस्तुत करती है जिससे आज की पीढ़ी को भी यह सीख मिलती है कि मित्रता केवल बराबरी वालों में नहीं की जाती.

राम हनुमान की मित्रता

रामायण में राम हनुमान की मित्रता का भी उल्लेख किया गया है. राम हनुमान का मिलन तभी होता है जब श्रीराम वनवासी के रूप में माता सीता की खोज में वन-वन भटक रहे थे. दक्षिण दिशा में मलय पर्वत की ओर जाते हुए राम लक्ष्मण को सुग्रीव के वानर देख लेते हैं और सुग्रीव को सूचित कर देते हैं.

सुग्रीव दोनों वनवासियों का पता लगाने के लिए अपने प्रिय मित्र हनुमान को उनके पास भेजते हैं. राम लक्ष्मण से मिलकर जब हनुमान को यह पता चलता है कि वे वनवासी नहीं अपितु अयोध्या के राजकुमार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हैं तो हनुमान जी तुरंत श्रीराम के चरणों में गिर जाते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं.

तभी से राम हनुमान को अपना परम भक्त और परम मित्र मान लेते हैं. सीता को सकुशल लंका से वापस लाने में हनुमान श्रीराम जी की पूरी सहायता करते हैं और साथ ही साथ अपने प्रभु श्रीराम की भक्ति व सेवा भी.

कर्ण दुर्योधन की मित्रता

महर्षि वेद व्यास जी द्वारा रचित हिंदू धर्म के सुप्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत में कर्ण और दुर्योधन की मित्रता का विशेष उल्लेख देखने को मिलता है. कर्ण दुर्योधन की मित्रता भी महाभारत में मित्रता की अनोखी मिसाल पेश करती है.

परमवीर और महादानी कर्ण दुर्योधन का निष्ठावान व सच्चा मित्र था. दुर्योधन ने पांडवों को हराने के लिए सदैव कुटिल चालों का ही प्रयोग किया लेकिन कर्ण ने सदैव ही दुर्योधन को सही मार्ग पर चलकर उसे एक वीर योद्धा की तरह अपने शत्रुओं को परास्त करने की सलाह दी.

कर्ण हमेंशा यह कहता था कि दुर्योधन को अपने युद्ध कौशल एवं वीरता से विजय प्राप्त करनी चाहिए न कि छल-कपट और कूटनीति का सहारा लेकर अपनी कायरता का प्रदर्शन करना चाहिए.

दुर्योधन ने कर्ण को हमेंशा अपनी बराबरी का दर्जा दिया और कर्ण ने भी अपनी मित्रता को निभाने के लिए महाभारत के युद्ध में वीरतापूर्वक युद्ध लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए.

कृष्ण अर्जुन की मित्रता

कृष्ण अर्जुन की मित्रता को महाभारत में गुरु-शिष्य का भी नाम दिया गया है. कृष्ण और अर्जुन दोनों ही एक-दूसरे के प्रति मित्रता की सच्ची भावना रखते थे. कृष्ण ने अर्जुन को दिए गए इस वचन का हमेंशा पालन किया कि वे अर्जुन के मित्र बनकर सदैव उनकी सहायता करेंगे.

महाभारत के युद्ध में अर्जुन का सारथी एवं सलाहकार बनकर श्री कृष्ण ने पांडवों को विजय दिलाई और अखंड भारत का सम्राट बना दिया.

सभी मित्रगणों को मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.